भारत में वर्षा जल संचयन की आवश्क्ता

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वर्षा जल को किसी खास माध्यम से संग्रहण या इकट्ठा करने की प्रक्रिया को वर्षा जल संचयन कहा जाता है। विश्व भर में पेयजल की कमी एक संकट बनती जा रही है। इसका कारण पृथ्वी के जलस्तर का लगातार नीचे जाना भी है। जब वर्षा होती है उस समय वर्षा जल ज्यादा बहकर नदी नाले के रास्ते होते हुये समुद्र मे मिल जाता है , उसका संग्रहण किया जाना अति आवश्यक है, ताकि पृथ्वी का जल स्तर बना रहे |

वर्षा जल संचयन करना अधिक सस्ती और आसान पद्द्ति से किया जा सकता है, कम समय लेने वाली है, और अपशिष्ट जल उपचार के लिए आवश्यक जटिल प्रणालियों की तुलना में इसे लागू करना आसान है। वर्षा जल संचयन भूजल और टैंकर जैसे निजी स्रोतों पर भारत की निर्भरता को कम करने में भी मदद करता है।

कई विकल्पों में से एक है कि हमें पानी की कमी के मुद्दे को कम करना है और वर्षा जल संचयन को लागू करना है। हम जिस महत्वपूर्ण स्थिति में हैं, उसे देखते हुए, वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित करना और इसे घरों और अपार्टमेंटों में अनिवार्य रूप से स्थापित करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय भारत सरकार के रिपोर्ट के अनुसार   वार्षिक पुनः पूर्ति योग्य भूजल संसाधन 44,000 BCM है। देश में 6584 मूल्यांकन इकाइयों (ब्लॉक / मंडल / तालुका / फ़िरकस) में से, विभिन्न राज्यों में 1034 इकाइयों को ‘अति-शोषित’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है, 253 इकाइयाँ महत्वपूर्ण हैं और 681 इकाइयाँ अर्ध-महत्वपूर्ण हैं।

दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश में अति-शोषित और महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाइयों की संख्या काफी अधिक पाई गई है। तेजी से शहरीकरण, वनों की कटाई आदि के साथ-साथ जलवायु और वर्षा के संभावित प्रभाव के कारण निरंतर जल दोहन के कारण भूजल शासन का सामना कर रहे तनाव के मद्देनजर जल संरक्षण और पुनर्भरण सभी आवश्यक हो गया है।

जल संसाधन विकास पर राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट (NCIWRD) के अनुसार, वर्षा के माध्यम से प्राप्त होने वाली भारत की कुल जल उपलब्धता लगभग 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) प्रति वर्ष है। वाष्पीकरण के बाद, 1869 बीसीएम पानी प्राकृतिक अपवाह के रूप में उपलब्ध है। स्थलाकृतिक और अन्य कारकों के कारण, उपयोग योग्य पानी की उपलब्धता प्रति वर्ष 1137 बीसीएम तक सीमित है, जिसमें सतह के पानी के 690 बीसीएम और पुन: उपयोग करने योग्य भूजल के 447 बीसीएम शामिल हैं। पानी की उपलब्धता अंतरिक्ष और समय दोनों में अत्यधिक असमान है, मानसून वर्ष में केवल चार महीनों तक ही सीमित होती है जिसमें पर्याप्त वर्षा जल के साथ-साथ वाष्पीकरण भी होता है। मेघालय में राजस्थान के पश्चिमी भागों में 100 मिलीमीटर (मिमी) से लेकर 10,000 मिलीमीटर तक वर्षा होती है।

वर्षा का जल शुद्ध और अच्छी गुणवत्ता वाला होता है | वर्षा ऋतु याते ही वर्षा का जल को धरती पर रोकने के उपया करना चाहिए | भारत के कई शहर गाँव ऐसे है जहां पृथ्वी का जल स्तर बहुत नीचे चला गया है | जिसका परिणाम यह हुया कि उस शहर गाँव के नदी, तालाब, पोखर, कुए, हेंड पम्प, बोर वेल सब सुख गए | उस शहर या गाँव के तालाब, पोखर, जमीन के अंदर वॉटर टेंक बना कर वर्षा का जल संग्रहण करना चाहिए ताकि उस जल को शुदिकरण कर उपयोग मे लाया जा सके । वर्तमान जलसंकट को देखते हुए यही एक मात्र विकल्प बचा है जिसके द्वारा हम जल संकट का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।

केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय , भारत सरकार के द्वारा हर वर्ष जल संरक्षण, के ऊपर राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता स्कूल मे रखी जाती है, जिससे बच्चे के माध्यम से बड़ो तक जल संरक्षण करने या इस संदर्भ पर सोच सके |

राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय , भारत सरकार के द्वारा एक मुहिम चलाई है जिसके अनुसार  आम जनता, संगठनों, गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से जल संरक्षण की दिशा में अपने सर्वोत्तम प्रयासों को आगे बढ़ाएं ताकि आपके कार्यों को जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय , भारत सरकार के की वेबसाइट में पोस्ट किया जा सके और इसे दोहराया जा सके। अन्य क्षेत्रों में भी सभी के लाभ के लिए। इस नेक कार्य में आम जनता की अधिक से अधिक भागीदारी का अनुरोध किया जाता है।Buy Now

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